मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

नवगीत : काल बली के कौड़े : अचला शर्मा



नवगीत  
काल बली के कौड़े  
अचला शर्मा  

मापनी 16/14

खेले प्रारब्ध खिलौने ज्यूँ
युद्ध छिड़े परछाई में
काल बली के कौड़े पड़ते
छाप छपी तरुणाई में।।

जब घड़ियों की चाल भटकती
पाट उठे हिय की ममता
आँचल का भी सम्बल छूटे
और उजड़ जाती समता
उल्टे दिन के भय से कम्पित
भाग्य सिसकते खाई में।।

बरगद की छाया चर जाती
पौधे सारे छोटों को
बुग्गी का बोझा खा जाता 
भारी भरकम झोटों को 
खेल रही है विधना सबसे 
भू सागर सर काई में।।

जन्म कहीं ले दूर बसे फिर
याद सताती अपनों की 
राज कुँवर की रानी गुड़िया 
गुल्लक फूटी सपनों की
नेह मिले कब और कहीं वो
जो माँ दादी ताई में।।

 

©अचला शर्मा

सोमवार, 13 दिसंबर 2021

नवगीत : चाबियों का गुच्छ : अचला शर्मा

 



नवगीत 

चाबियों का गुच्छ

अचला शर्मा 


मापनी 14/14 


चाबियों का गुच्छ पूछे 

क्यों कमर को तोड़ती हो

और प्रिय छल्ला छिपाकर

घाघरे में मोड़ती हो।।


शीश का ये बोरला यूँ

स्वर्ण आभा सा चमकता

काँच की इन चूड़ियों को

देख कर कंगन दमकता

स्वर्ण इतना है रजत फिर

लौहमय क्यों जोड़ती हो।।


पायलों की खनखनाहट

बोलती है राग प्यारे

पग उठे जितने जहाँ भी 

साथ रहती वो तुम्हारे

झांझरो के मध्य भद्दा 

सुर हमारा फोड़ती हो।।


अंत में बोली कमर सुन

लौह की हो चाबियाँ तुम

स्वर्ण देवर से रजत ये

और इनकी भाभियाँ तुम 

गर्व इनका तुम बनी हो

साथ क्यों यूँ छोड़ती हो।।


©अचला शर्मा





नवगीत : काल बली के कौड़े : अचला शर्मा

नवगीत   काल बली के कौड़े   अचला शर्मा   मापनी 16/14 खेले प्रारब्ध खिलौने ज्यूँ युद्ध छिड़े परछाई में काल बली के कौड़े पड़ते छाप छपी तरुणाई में।।...