नवगीतकाल बली के कौड़ेअचला शर्मामापनी 16/14खेले प्रारब्ध खिलौने ज्यूँयुद्ध छिड़े परछाई मेंकाल बली के कौड़े पड़तेछाप छपी तरुणाई में।।जब घड़ियों की चाल भटकतीपाट उठे हिय की ममताआँचल का भी सम्बल छूटेऔर उजड़ जाती समताउल्टे दिन के भय से कम्पितभाग्य सिसकते खाई में।।बरगद की छाया चर जातीपौधे सारे छोटों कोबुग्गी का बोझा खा जाताभारी भरकम झोटों कोखेल रही है विधना सबसेभू सागर सर काई में।।
जन्म कहीं ले दूर बसे फिरयाद सताती अपनों कीराज कुँवर की रानी गुड़ियागुल्लक फूटी सपनों कीनेह मिले कब और कहीं वोजो माँ दादी ताई में।।
©अचला शर्मा

बहुत ही शानदार नवगीत 👌
जवाब देंहटाएंसोचने को प्रेरित करते बोलते बिम्ब 👌
नमन आपकी लेखनी को 🙏
बहुत ही शानदार नवगीत बोलते बिम्ब बेहतरीन गजब सादर प्रणाम
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर! चेतना को झकझोरता नव गीत।
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