सोमवार, 13 दिसंबर 2021

नवगीत : चाबियों का गुच्छ : अचला शर्मा

 



नवगीत 

चाबियों का गुच्छ

अचला शर्मा 


मापनी 14/14 


चाबियों का गुच्छ पूछे 

क्यों कमर को तोड़ती हो

और प्रिय छल्ला छिपाकर

घाघरे में मोड़ती हो।।


शीश का ये बोरला यूँ

स्वर्ण आभा सा चमकता

काँच की इन चूड़ियों को

देख कर कंगन दमकता

स्वर्ण इतना है रजत फिर

लौहमय क्यों जोड़ती हो।।


पायलों की खनखनाहट

बोलती है राग प्यारे

पग उठे जितने जहाँ भी 

साथ रहती वो तुम्हारे

झांझरो के मध्य भद्दा 

सुर हमारा फोड़ती हो।।


अंत में बोली कमर सुन

लौह की हो चाबियाँ तुम

स्वर्ण देवर से रजत ये

और इनकी भाभियाँ तुम 

गर्व इनका तुम बनी हो

साथ क्यों यूँ छोड़ती हो।।


©अचला शर्मा





17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही खूबसूरत नवगीत आदरणीया 🙏
    शानदार शब्दचयन और खूबसूरत भाव 💐💐💐💐
    नमन आपकी लेखनी को 🙏

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  2. बहुत ही अलग हट कर नवगीत,
    सारगर्भित भाव सुंदर लय ।
    अप्रतिम अनुपम।

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  3. बहुत ही सुन्दर सृजन दीदी जी

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  4. अनूठे बिंबों से सुसज्जित, सुदृढ़ भाव पक्ष के साथ सधे हुये शिल्प में सृजित एक अद्वितीय नवगीत👏👏👏👏👏👏👏👏👏

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  5. बहुत सुंदर नवगीत आदरणीया, सुंदर बिंबों से सुसज्जित

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  6. बहुत सुंदर और सटीक रचना । बहुत खूब ।

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  7. भावप्रधान सुंदर रचना ,बधाई

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  8. भावों से ओतप्रोत रचना 🙏💐

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