नवगीत
चाबियों का गुच्छ
अचला शर्मा
मापनी 14/14
चाबियों का गुच्छ पूछे
क्यों कमर को तोड़ती हो
और प्रिय छल्ला छिपाकर
घाघरे में मोड़ती हो।।
शीश का ये बोरला यूँ
स्वर्ण आभा सा चमकता
काँच की इन चूड़ियों को
देख कर कंगन दमकता
स्वर्ण इतना है रजत फिर
लौहमय क्यों जोड़ती हो।।
पायलों की खनखनाहट
बोलती है राग प्यारे
पग उठे जितने जहाँ भी
साथ रहती वो तुम्हारे
झांझरो के मध्य भद्दा
सुर हमारा फोड़ती हो।।
अंत में बोली कमर सुन
लौह की हो चाबियाँ तुम
स्वर्ण देवर से रजत ये
और इनकी भाभियाँ तुम
गर्व इनका तुम बनी हो
साथ क्यों यूँ छोड़ती हो।।
©अचला शर्मा
बहुत ही खूबसूरत नवगीत आदरणीया 🙏
जवाब देंहटाएंशानदार शब्दचयन और खूबसूरत भाव 💐💐💐💐
नमन आपकी लेखनी को 🙏
Bahut sundar
जवाब देंहटाएंबहुत खूब
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर है
जवाब देंहटाएंलाजवाब , सुंदर बिम्ब
जवाब देंहटाएंलाजवाब 👌👌
जवाब देंहटाएंबहुत ही अलग हट कर नवगीत,
जवाब देंहटाएंसारगर्भित भाव सुंदर लय ।
अप्रतिम अनुपम।
बहुत ही सुन्दर सृजन दीदी जी
जवाब देंहटाएंAti uttam
जवाब देंहटाएंअतिउत्तम
जवाब देंहटाएंअनूठे बिंबों से सुसज्जित, सुदृढ़ भाव पक्ष के साथ सधे हुये शिल्प में सृजित एक अद्वितीय नवगीत👏👏👏👏👏👏👏👏👏
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर नवगीत आदरणीया, सुंदर बिंबों से सुसज्जित
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर और सटीक रचना । बहुत खूब ।
जवाब देंहटाएंवाह अद्भुत
जवाब देंहटाएंभावप्रधान सुंदर रचना ,बधाई
जवाब देंहटाएंअति सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंभावों से ओतप्रोत रचना 🙏💐
जवाब देंहटाएं